ॐ तत्सत् 🌷
अघोर रुद्र की विशिष्ट साधना .... 💥
( शिव-शक्ति साधको हेतु करणीय विशिष्ट सात्विक अघोर साधना विधान 🌹)
🙏 पशुपति सदाशिव के दक्षिण वक्त्ररूप अघोर रूद्र का तीन भाव जानने में आता है-- अघोर, घोर और घोरतर ।
🌸तीनों भावों के संयुक्त रूप को अघोर रूद्र की संज्ञा प्राप्त है। अघोर रूद्र के निर्मल स्वच्छरूप का ध्यान मोक्ष प्रदाता, रक्तवर्णी अघोर का ध्यान काम सिद्धि हेतु और कृष्ण वर्णी अघोर रूद्र का ध्यान मारण-मोहनादि घोर तांत्रिक अभिचार की सिद्धि-निवृत्ति साथ ही प्रतिकूल ग्रहों की मारक प्रभाव से निवृत्ति में अचूक परिणाम प्रदान करता है।
☝️ अघोर रूद्र की साधना साधक को अभयता प्रदान करती है।
अघोर ध्यान :- 🌷🌷🌹
कालाभ्राभः कराग्रे: परशुडमरुकौ खड्गखेटौ च वाणे
-ष्वासो शूलं कपालं दधदतिभयदो भीषणास्यस्त्रिनेत्रः ।
रक्ताकाराम्बरो.हिप्रवरघटितगात्रो.रि नाग ग्रहादीन् ,
खादन्निष्टार्थदायी भवदनभिमतोच्छित्तये स्याद्घोरः ।। 🙏
🌺 भावार्थ :- प्रलयकालीन मेघों के समान कृष्णवर्णी, हाथों में परशु, डमरू, खड्ग, ढाल, वाण, धनुष, त्रिशूल और कपाल धारण करने वाले अष्टभुजी, अत्यंत भयप्रदायक, भीषण मुख वाले, त्रिनेत्र, रक्तवस्त्र धारण किये, शरीर पर सर्पों की सज्जा किये, भक्तों को अभिलषित वर प्रदान करने वाले, उनके शत्रुओं, दुष्टों, नागों एवं ग्रहादि का भक्षण कर रहे भगवान अघोर हमारे सभी विरोधियों का उच्छेदन करें । 🙏
🌹॥ " ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह बम बम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् " ॥
🙏🌹🌺🌸💥
🌷 ॐ अस्य अघोर मन्त्रस्य ऋषिर्घोर:, छंदस्त्रिष्टुप्, देवता अघोर रुद्रः, बीजम् हुं, ह्रीं शक्तयै: विनियोगः ।
🌷 ऋष्यादि न्यास :- अघोरर्षये नमः .. (शिरसि) ।
त्रिस्टुब् छन्दसे नमः .. (मुखे)।
अघोररुद्र देवतायै नमः .. (हृदये),
हुं बीजाय नमः (गुह्ये),
ह्रीं शक्तयै नमः . ( पादयोः)।
🌷षडंग न्यास:-
ह्रीं स्फुर स्फुर -- हृदयाय नमः,
प्रस्फुर प्रस्फुर - शिरसे स्वाहा ,
घोर घोरतर तनुरूप -- शिखायै वषट्,
चट चट प्रचट प्रचट -- कवचाय हुं,
कह कह बम बम -- नेत्रत्रयाय वौषट्,
बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् -- अस्त्राय फट् ।
🌞 स्वविग्रह न्यास :-
पाँच (ह्रीं स्फुर स्फुर),
छः (प्रस्फुर प्रस्फुर),
दो ( घोर ),
आठ (घोरतर तनुरूप),
चार (चट चट),
छः (प्रचट प्रचट ),
चार ( कह कह ),
चार (बम बम),
चार (बन्ध बन्ध),
छः ( घातय घातय ),
तथा दो ( हुम् फट् ) --
अक्षरों के ग्यारह भागों में विभक्त अघोर मन्त्र का न्यास क्रमशः मूर्धा, नेत्र, मुख, कण्ठ, ह्रदय, नाभि, लिङ्ग उरु, जानु, जंघा और पैरों में करना चाहिए। ☝️
🌸 आवरण पूजन :- मन्त्रों के परिस्फुरण हेतु आवरण पूजा के लिए अष्टदल कमल का निर्माण करके उसकी कर्णिका में भुवनेशी बीज (ह्रीं) लिख कर उसके भीतर साध्यनाम पुटित करना चाहिए।
🌸 तत्पश्चात साध्यनाम सहित भुवनेशी बीज को बिंदु युक्त अं आं आदि सोलह स्वरों से वेष्टित करना चाहिए ।
🌸 पुनः पूर्वादि क्रम से पाँच दलों में से प्रत्येक में क्रमशः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग तथा पवर्ग के पाँच-पाँच अक्षर, छठे दल में य, र, ल, व सातवें में श, ष, स, ह तथा आठवें में ळ, क्ष अक्षर लिखना चाहिये ।
🌸 पुनः अष्टदलों के मध्य 'ह्रीं' बीज लिखने के बाद आठ दलों के बीच में अघोर मन्त्र के तीन-तीन अक्षर और दलाग्रो में मन्त्र के शेष अक्षरों में से तीन तीन अक्षर लिखने चाहिए।।
🌸 पश्चात यन्त्र के बाहर षट्कोण बनाकर पूर्व, नैर्ऋत्य और वायव्य कोणों में हुं तथा पश्चिम, आग्नेय और ईशान कोणों में फट् लिखना चाहिए।
🌸 यंत्र के मध्य में भगवान् अघोर का आवाहन कर यन्त्र के मध्य में अघोर, प्रथम आवरण में अंग मन्त्र, द्वितीय में अघोर के परशु आदि आयुध, तृतीय में ब्रह्माणी आदि अष्टमातृवर्ग और चतुर्थ आवरण में आयुध सहित इन्द्रादि दिक्पालों की पूजा करनी चाहिए ।
🌸अघोर की आवरणपूजा षडक्षर मन्त्र 'ॐ नमः शिवाय' की पूजा विधि से भी की जा सकती है।
🌸 मन्त्रौषधि :- रात्रि में घृतयुक्त अपामार्ग की समिधा, तिल, सरसों, पायस तथा घी के सम्मिलित अथवा अलग-अलग एक-एक सहस्र हवन करने से भूतादि से उत्पन्न रोग तथा रोगों की समाप्ति होती है।
🌸 श्वेत पुष्प वाले पलाश, निर्गुण्डी, कनक (धतूर) तथा अपामार्ग की समिधाओं को मिला कर अथवा अलग-अलग एक-एक हजार हवन करने से ग्रहों के बन्धन (पीड़ा) से तत्काल मुक्ति मिल जाती है ।
🌸 शिव पञ्चमी (शुक्ल पंचमी) की रात्रि में पंचगव्ययुक्त अपामार्ग की समिधा से दश हजार हवन करके, फिर आरग्वध (अमलताश) की समिधा से दश हजार हवन करने से, अथवा पंचगव्य सहित घृत और अपामार्ग की हवि से दश हजार हवन करने के बाद बचे घृत-सम्पात से बचा हुआ घृत ग्रहपीड़ित व्यक्ति को खिलाने से उसके सारे प्रतिकूल ग्रह शान्त हो जाते हैं ।
🌞 अघोर यन्त्र :- पहले षट्कोण के मध्य अष्टदल कमल निर्मित कर उसकी कर्णिका में अघोर मन्त्र के 'स्फुर स्फुर' वर्णयुक्त 'ह्रीं' बीज, फिर बीज ह्रीं के मध्य साध्य नाम तथा कर्मादि, तदनन्तर षट्कोण के छः कोणों में अग्र भाग में मन्त्र के 'प्रस्फुर प्रस्फुर' अंश के एक-एक अक्षर, फिर दलों में पूर्वादि क्रम से छह (घोर घोरतर ), चार (चट चट), छः (प्रचट प्रचट ), चार (कह कह), चार (बम बम), चार (बन्ध बन्ध) और छह (घातय घातय) अक्षर लिखने चाहिये । फिर इस षट्कोण के बाहर पूर्व, नैर्ऋत्य और वायव्य दिशा वाले कोण में अघोर मन्त्र का वर्माक्षर 'हुं' तथा पश्चिम, आग्नेय और ईशान वाले कोणों में अघोर मन्त्र का अन्तिम अक्षर 'फट्' लिखना चाहिए । विधिवत् अर्चित यह अघोर-यन्त्र ग्रहपीड़ा तथा रोगादिकों के भय का हरण करने वाला है।
✌️अघोर मन्त्र का जप, पूजन, हवन आदि करने वाले साधक को शत्रु, रोग, ग्रहपीडा, शस्त्र भय तथा ज्वरादिक रोग स्पर्श भी नहीं कर सकते ।
अलख निरञ्जन 🌞🌸🌺🌹🌷
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भगवत्कृपा हि केवलम्।🌹
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